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रविवार, 14 जुलाई 2013

हिंदी सिनेमा में नृत्य : नाच? कवायद? कसरत? (अंतिम)

 ए ग्रेड से लेकर सी ग्रेड की फिल्मों में सोलो डांसर का पहले बेहद महत्व माना जाता था। अच्छा नृत्य जानने वाली डांसर के लिए अलग से उस पर गीत फिल्माएं जाने का चलन भी था, जो अब करीब  करीब खत्म हो गया है। दक्षिण की भरतनाट्यम-कुशल किशोरवय की बहनों साई, सुब्बलक्ष्मी के नृत्य की मांग भी एक समय की खास मांग हुआ करती थी। दर्शकों को फिल्म चोरी चोरी में उनके "मनभावन के घर जाए गोरी ..." और फिल्म आजाद में "अपलम चपलम ...." गीत में उनके नृत्य याद होंगे। 
उसके बाद मधुमती का स्थान अग्रणी समझा जाता है। ठाणे में उन्होंने पांच साल तक कथक और आठ साल तक भरतनाट्यम का प्रशिक्षण लिया। फिर आगे की तालीम गुरु चंद्रशेखर से ली। छोटी उम्र से ही वे स्टेज शो करने लगी थी। इसे देख कर ही निर्माता धीरु भाई देसाई ने उन्हें फिल्म राजा हरिशचंद्र के लिए साइन किया था। इसमें उन्होंने एक अप्सरा का नृत्य किया था। यह 1958-59 की बात है। उन्होंने बताया कि वैजयंतीमाला की नृत्य प्रधान फिल्में देखकर ही मैं इस लाइन में आई थी। हीरालाल, मोहनलाल, गोपीकृष्ण पी.एल. राज मेरे खास गुरुओं में से हैं।  मधुमती ने करीब ग्यारह सौ फिल्मों में नृत्य किया है। वे बताती हैं फिल्म तलाश विदेश फिल्मोत्सव में गई थी। तब वहां "तेरे नयना तलाश करके ..." नृत्य गीत को काफी पसंद किया गया था। फिर इसकी डांस कटिंग को संग्रहालय में रख लिया गया। फिल्म मेरे हुजूर के नृत्य गीत "झनक झनक तोरी बाजे पायलिया..." भी बेहद हिट हुआ था।
मधुमती के पति और निर्माता मनोहर दीपक भी विख्यात लोक नर्तक हैं। वे ही हिंदी फिल्मों में भंगड़ा नृत्य लाए। गौरतलब है कि मधुमती रिटायर होने के बाद भी गोपीकृष्ण की तरह डांस क्लास चला रही हैं। उन्होंने पंद्रह साल पहले सांताक्रुज से जुहू आकर एक्टिंग एंड डांसिंग अकादमी शुरू की। अपने शिष्यों को लेकर उन्होंने जी टीवी के लिए नृत्य प्रधान सीरियल जलवा का निर्माण शुरू किया है। उन्हें यह विश्वास है कि हिंदी फिल्मों में शास्त्रीयता का युग फिर लौटेगा।
मधुमती के दौर की हेलन भी हैं। लेकिन वे पश्चिमी नृत्य के लिए इंडस्ट्री में जानी जाती रहीं। वे ग्रुप डांसर से सोलो डांसर बनीं। फरियाल और बिंदु भी कैबरे और मुजरे तक सिमट कर रह गई। जबकि जयश्री टी. पश्चिमी और शास्त्रीय नृत्य में बराबर दखल रखती हैं। उनके मुताबिक़ दुनिया का ऐसा कोई डांस नहीं है जिसे मैं नहीं जानती हूँ। हर भाषा की फिल्मों में मैंने डांस किया है।बचपन से ही उन्होंने शास्त्रीय नृत्य की तालीम लेनी शुरु कर दी थी। गोपीकृष्ण से दो साल कथक भी सीखा। मराठी फिल्म बायांनो नवरे सांभाळा (1974) में उन्होंने गोपीकृष्ण के साथ अर्जुन- उर्वशी नृत्य नाटिका पेश की थी। हिंदी में उनकी पहली फिल्म अभिलाषा थी। उन्होंने बताया कि वैसे मेरी हिंदी फिल्मों में एंट्री पश्चिमी नृत्य के लिए हुई। क्लासिकल डांस उस वक्त धार्मिक फिल्मों में ज्यादा हुआ करते थे। मैं सभी डांस मास्टर की प्रिय नर्तकी थी। मुझ पर उन्हें मेहनत कम करनी पड़ती थी। हीरालाल के साथ जब मैं फिल्म तेरे मेरे सपने कर रही थी, तब वे मुझसे काफी प्रभावित हुए। मीनाक्षी शेषाद्रि के साथ जब मैंने फिल्म औरत तेरी यही कहानी की तो मेरी स्टेपिंग देख कर कमल मास्टर बहुत खुश हुए थे। पुराने डांस मास्टर की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि, पुराने डांस मास्टर हमें सुबह पांच बजे रिहर्सल पर बुलाते थे फिर शिफ्ट शुरू होती थी। लेकिन आज किसी के पास मानो टाइम नहीं हैं। जयश्री टी. इस वक्त अपने निर्देशक पति जयप्रकाश कर्नाटकी के साथ मिल कर जी टीवी के लिए धारावाहिक सिने नर्तकी बना रही हैं। यह पुरानी और नई फिल्म अभिनेत्री- नर्तकियों पर आधारित होगा।
कल्पना अय्यर, बिंदु, लक्ष्मीछाया, मीना टी. और सिल्क स्मिता (दक्षिण) का इस्तेमाल इंडस्ट्री ने सेक्सी गीतों में अधिकाधिक किया। उनकी नृत्य- प्रतिभा को सही ढंग से साकार नहीं कराया गया। नृत्य सिर्फ नायिकाओं का क्षेत्र नहीं बल्कि नायक, नर्तक भी काफी नामचीन रहे हैं। इनमें सबसे पहले नाम याद आता है फिल्म झनक झनक पायल बाजे के नर्तक नायक गोपीकृष्ण का। इस फिल्म की कहानी की मांग ही थी नर्तक नायक की! लिहाजा झनक झनक पायल बाजे न बनी होती तो शायद गोपीकृष्ण कभी नायक ही न बने होते। झनक झनक पायल बाजे में वे नायक बने। फिल्म बेहद सफल हुई। मगर बाद में वे किसी और फिल्म के नायक कभी नहीं बने। क्योंकि मूलत: वे सिर्फ नर्तक थे।
बहुत कम लोग जानते होंगे कि गुरुदत्त ने अपने फिल्म जीवन की शुरुआत नृत्य निर्देशन के क्षेत्र से ही की थी। इसी प्रकार बाल कलाकर की हैसियत से फिल्मों में आए कमल हासन भी पहले नृत्य- निर्देशक बने, फिर नायक। कमल हासन की नृत्य निपुणता का लाभ उठाने के लिए तमिल में फिल्म सागर संगमम् बनी थी, जो काफी लोकप्रिय भी रही। कमल हासन के नृत्य का प्रयोग हिंदी में फिल्म एक दूजे के लिए में भी किया गया और थोड़े परिवर्तनों के साथ फिल्म सागर में भी। सागर में ऋषि कपूर ने उनका साथ खूब दिया। क्योंकि ऋषि में भी अपने पिता की ही तरह नृत्य का लोच, अंदाज उतरा है। कमल हासन नर्तक होने के साथ साथ सशक्त अभिनेता भी हैं और ये दोनों तत्व उनके व्यक्तित्व में बराबर एक दूसरे के पूरक बने रहे हैं। इसका बहुत सुंदर प्रयोग सागर संगमम् में देखने को मिलता है। लेकिन अधिकतर नायकों ने नाचने के लिए पश्चिमी शैलियों का ही सहारा लिया। भगवान दादा की अपनी अलग शैली थी, जिसका अनुकरण आज भी किया जा रहा है। फिल्म फर्ज से जीतेंद्र ने नाच की अपनी शैली प्रस्तुत की और इस शैली का अनुकरण फिर कई लोगों ने किया। गोविंदा से लेकर करीब करीब सभी नायकों ने ! जीतेंद्र की शैली ने उन्हें डांसर से ज्यादा जंपिंग जैक बना दिया। नायक- नायिका बाग में एक दूसरे से मुखातिब होने की बजाय कैमरे से मुखातिब होकर जब नाचते हैं तो स्थिति बड़ी ही हास्यास्पद हो जाती है। यह शैली आज तक चली आ रही है और उसकी हास्यास्पदता का खयाल किसी को नहीं आ रहा।
मिठुन चक्रवर्ती का नृत्य अक्सर एक्शन की वेदी पर बलि चढ़ता रहा। सिनेमा हॉल में आगे की सीट पर बैठने वाले युवा दर्शकों में इनके नाच का क्रेज काफी है। किंतु गंभीर दर्शक इसे पचा नहीं पाते हैं। कमर को झटके देकर, कूल्हे हिला कर नाचने में गोविंदा को महारत हासिल है। पश्चिमी शैली वाले नृत्य- निर्देशकों के ये प्रिय पात्र हैं। गोविंदा का इनसे हमेशा आग्रह रहता है कि वे उसे मटकाऊ अंदाज में नचाएं। हिंदी फिल्मों में जब से ब्रेक डांस ने अपनी जगह बनाई, तब से वह फिल्म की खासियत भी बन गया। कोई भी प्रसंग हो उसमें ब्रेक डांस ठूंस दिया जाता है। ब्रेक डांसर का रोल जावेद जाफरी के बिना अधूरा समझा जाने लगा। वे नृत्य निर्देशकों की पहली जरूरत बन गए। फिर प्रसंग मांग करे न करे, हर कोई ब्रेक डांस करने लगा। जहां नृत्य की गुंजाइश न हो वहां भी नायक- नायिका को दिवास्वप्र देखने पर मजबूर किया जाता है और एक समूह नृत्य करवाया जाता है। नृत्य, नृत्य के लिए, नृत्य कला के लिए न होकर ग्लैमर, कथित संगीत के शोर के लिए, अजीबोगरीब कास्ट्यूम्स के प्रदर्शन के लिए ऊटपटांग मगर भव्य सेटों के लिए बड़े बजट से दर्शकों को अंधा बना देने के लिए किया जा रहा है। एम टीवी जैसे चैनल इस ऊटपटांग नाच- कवायद - कसरत को फिल्मी परदे से घरों के अंदर ले आ चुके हैं। दुनिया झूम रही है। इसे देख समझना मुश्किल होता है कि यह नशे में झूम रही है या कथित नृत्य कर रही है? उस शोर में, रंगीन अंधेरों- रंगीन उजालों की आंख मिचौली के बीच नर्तक-नर्तकी- नायक- नायिका की शक्लें पहचानना भी मुश्किल होता जा रहा है।ऐसे में नृत्य कला को ढूंढ़े तो कहां ढूंढ़े? (समाप्त )
- दिनेश ठक्कर
(इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के "एक्सप्रेस स्क्रीन", मुम्बई के 3 दिसंबर 1993 के अंक में आवरण कथा बतौर प्रकाशित)
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