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बुधवार, 10 जुलाई 2013

हिंदी सिनेमा में नृत्य : नाच ? कवायद ? कसरत ? ( भाग- 2)

पहले जमाने में हीरोइन बिस्तर पर गाना गाती थी। फिर वह खिड़की के पास आई। उसे खोला और गाना गाया। हीरो ने भी इसी तरह किया। इसके बाद हीरोइन घर से आंगन में आई। फिर हीरो- हीरोइन गार्डन में आए। नजदीक आकर एक दूसरे का हाथ पकड़ा और गाया। जमाना बदला। आंख मिचैली शुरू हुई। झाड़ में छुप गए। पल्लू खींचे। भाग-दौड़ हुई। गाना गाए। फिर समय बदला। हीरो भाग कर आता है। हीरोइन से लिपट जाता है। दोनों गाना गाते हैं। अब हीरोइन खुद हीरो पर चढ़कर गाना गाती है। हीरो को वह हाथ से नहीं, बल्कि वक्ष से मारती है। यह सेक्स और वायलेंस का जमाना है। गानों के फिल्मांकन का यह मजेदार क्रम बताते हुए वरिष्ठ नृत्य- निर्देशक पी. एल. राज खिलखिला पड़ते हैं। पहले वे ग्रुप डांसर थे। निर्देशक नानू भाई वकील ने उन्हें वर्ष 1957 में स्वतंत्र नृत्य- निर्देशन का मौका दिलाया। फिल्म लव मैरिज, जंगली, प्रोफेसर, शिकारी, गुमनाम, तीसरी मंजिल, इंतकाम, प्यार ही प्यार, सीता और गीता, शोले, शान, शक्ति, सागर, सरगम, आंधी तूफान, पाप की दुनिया, शोला और शबनम, सनम बेवफा आदि उनकी चर्चित फिल्में हैं।  नाडियाडवाला की फिल्म चित्रलेखा के लिए उन्हें नेहरू पुरस्कार मिला था।
राज बताते हैं, पहले सोलह बीट का एक शॉट होता था। एक अंतरे का एक शॉट होता था। फिर वह आठ, चार, दो और आज एक हो गया है। फास्ट फुड की तरह गानों का फिल्मांकन होने लगा है। नृत्यों के लिए यह नुकसानकारक है। लेकिन वक्त की घड़ी पर जो चलता है वहीं आगे बढ़ता है। मैं भी इसी राह पर चल रहा हूं। तो आप चोली के पीछे क्या है ... और चढ़ गया कबूतर.. जैसे गीतों की कोरियोग्राफी के पक्षधर हैं? बिलकुल हूं, राज ने बचाव की मुद्रा में कहा, बल्कि गांवों में तो कुछ लोक गीत- नृत्य ऐसे होते हैं जो अश्लील और द्विअर्थी होते हैं। पुरानी फिल्मों में जोबनिया जैसे शब्दों का इस्तेमाल हो चुका है, फिर चोली के पीछे सब क्यों पड़े हैं। 
कल्पनाशील नृत्य- निर्देशकों में कमल मास्टर अव्वल थे। उनकी असमय मौत से इंडस्ट्री को गहरा झटका लगा है। सोहन लाल और पी. एल. राज के बाद उनका क्रम आता है। अपने इन गुरुओं की खूबियों को उन्होंने आत्मसात किया था। फिल्म धरती कहे पुकार के से उन्होंने स्वतंत्र निर्देशन की पुकार लगाई। इसके पश्चात कमल खिलता ही गया। फिल्म डॉन, मुकद्दर का सिकंदर, शराबी, जादूगर, जिंदगी और जुआ, खुदगर्ज, खून भरी मांग उल्लेखनीय रहीं। जय विक्रांत उनकी आने वाली फिल्मों में प्रमुख है। कमल मास्टर अमिताभ बच्चन और रेखा के पसंदीदा नृत्य निर्देशक थे। निर्देशक बनने की तमन्ना ने उन्हें तनाव से ग्रस्त कर दिया था। अधूरी फिल्म दुश्मन दोस्त ने उन्हें आर्थिक रूप से भी तोड़ दिया था। पुराने गीतों पर नए  नायक- नायिकाओं को नचाने के लिए वीडियो फिल्म नया अंदाज भी बनाई। लेकिन अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली। अपने बेटे को हीरो बनाने के चक्कर में उन्होंने फिल्म चाहूंगा मैं तुझे निर्देशित की। फिल्म में साठ फीसदी धन भी लगाया। किंतु फिल्म फ्लॉप हो जाने से कमल मास्टर पर फिर गाज गिरी। तनाव और बढ़ गया। दिमाग की नसें फट गईं और इंडस्ट्री को सदा के लिए अलविदा कह दिया। लेकिन कमल मास्टर की शैली इंडस्ट्री के लिए धरोहर बन चुकी है। 
आज के हीरो- हीरोइन क्लासिकल डांस नहीं करना चाहते, उनकी दिलचस्पी वेस्टर्न में है। विदेश में हमारा धोती- लहंगा अपनाया जा रहा है, शास्त्रीय नृत्य सीखा जा रहा है और हमारे यहां कम कपड़े पहन कर ठुमके लगाए जा रहे हैं। वैसे मुझे भरोसा है फिल्मों में पुराना दौर आएगा। लेकिन कब और किस तरीके से, यह कहा नहीं जा सकता। माधव किशन ने पी.एल. राज के तर्क पर इस तरह अपनी असहमति जाहिर की। इनका दावा है कि, यदि हीरो- हीरोइन क्लासिकल डांस सीख लें तो दूसरे डांस को फॉलो कर सकते हैं। देखा जाए तो वेस्टर्न डांस में भी क्लासिकल टच है। लेकिन वह हमारे यहां सही तरीके से कहां होता है?
माधव किशन ऐसे नृत्य निर्देशक हैं जिन्होंने हमेशा इस बात का ध्यान रखा है नृत्य संयोजन में अश्लीलता न आने पाए। वे गोपीकृष्ण के भाई हैं। गोपीकृष्ण, सोहनलाल और कमल मास्टर के वे सहायक रह चुके हैं। बतौर स्वतंत्र नृत्य निर्देशक इनकी पहली फिल्म पुतली बाई थी। इसके बाद हंसते जख्म, बिंदिया और बंदूक, गीत गाता चल, जानेमन, रजिया सुलतान, हिंदुस्तान  की कसम, गोपाल कृष्ण, प्रतिमा और पायल, मीरा के गिरधर, गेम, तिरंगा और हम हैं राही प्यार के इनकी नामी फिल्में हैं। वे अपने लखनऊ घराने की कथक शैली को अवसर मिलते ही इस्तेमाल करने से नहीं चूकते हैं। तोड़े, टुकड़े और परन उन्हें अच्छे लगते हैं।
अश्लीलता परोसते नृत्य
मौजूदा नए नृत्य निर्देशक हीरो- हीरोइन को मर्यादा के बाहर गानों में आलिंगनबद्ध करवाते हैं। अश्लीलता का पुट अधिक रहता है। इस तथ्य का दूसरा नजरिया रखते हैं चिन्नी प्रकाश। उनका मानना है, आज दर्शकों में फर्क आ गया है। उनके जीवन स्तर में अंतर आ गया है। बाप बेटा दोस्त बन गए हैं। ऐसे में हीरो- हीरोइन को दूर-दूर दिखाएंगे तो कैसे चलेगा? उन्हें एक दूसरे से चिपटना ही पड़ेगा। जहां तक अश्लीलता का प्रश्न है तो इसकी शुरुआत फिल्म दलाल के कबूतर वाले गाने से हमने नहीं की है, बल्कि खलनायक के चोली गाने से हुई है। अब तो यह और भी ज्यादा होगा जब तक दर्शक बोर न हो जाएंगे।
चिन्नी प्रकाश का घरेलू नाम जयप्रकाश है। चिन्नीलाल उनके पिता थे। वे संपत के साथ जोड़ी बनाकर नृत्य निर्देशन करते थे। चिन्नी प्रकाश अपने पिता और चाचा सोहनलाल, हीरालाल और राधेश्याम के सहायक रह चुके हैं। उनका नृत्य संयोजन हीरालाल की शैली में होता है। वे तमिल फिल्मों में अभिनय का शौक भी पूरा कर चुके हैं। लेकिन फ्लॉप होने पर नृत्य निर्देशन को पूरी तरह अपना लिया। वर्ष 1982 में वे तेलुगू फिल्म मि. विजय से स्वतंत्र नृत्य निर्देशक बने। एस. रामानाथन की फिल्म प्यार करके देखो इनकी पहली हिंदी फिल्म थी। गोविंदा उसके हीरो थे। फिल्म महासंग्राम और हत्या गोविंदा ने ही दिलवाई थी। पुलिस ऑफिसर, इज्जत, वक्त हमारा हैं, साजन, खिलाड़ी, हम, रूप की रानी चोरों का राजा आदि फिल्मों में इनका ग्रुप डांस लोकप्रिय हुआ। 
दक्षिण भारत और मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में नृत्य- गीत के फिल्मांकन में खास अंतर बताते हुए उन्होंने कहा, मुम्बई में कभी भी एक शिफ्ट में गाना नहीं फिल्माया जा सकता है, क्योंकि समय की पाबंदी नहीं है। इससे क्वालिटी भी नहीं आ पाती है। जबकि दक्षिण में इसका उलटा है। यदि शेड्यूल टाइम से एक दिन पहले गाने शूट हो जाते हैं तो निर्माता के एक लाख रुपए बच सकते हैं।इन दिनों एक फिल्म के गानों के लिए अलग- अलग नृत्य निर्देशक लेने का चलन बढ़ गया है। इसे आप सही मानते हैं या गलत? चिन्नी प्रकाश ने तरफदारी करते हुए कहा, सही है ! मैं सौ-दो सौ लोगों के साथ फास्ट मूवमेंट करवाता हूं,  इसलिए मुझे लिया जाता है। मेरी पत्नी रेखा को सॉफ्ट डुएट सांग के लिए, तरुण कुमार को लड़कियों के ग्रुप के लिए और सरोज खान को सेक्सी क्लासिकल फोक के लिए यदि एक ही फिल्म में लिया जाता है तो विविधता जरूर आएगी। माइकल जैक्सन के प्रशंसक चिन्नी प्रकाश की महत्वाकांक्षा है कि वह हॉलीवुड की फिल्म में नृत्य निर्देशन करें। उन्हें वक्त का इंतजार है।
चिन्नी प्रकाश की पत्नी रेखा की इच्छा है कि हिंदी फिल्मों में शास्त्रीय नृत्य नए- अंदाज में लौटे, लेकिन उसका मूल आधार शास्त्रीय ही हो। उन्होंने अपने ससुर और गुरु चिन्नी लाल की स्टाइल को अपना कर खुद के मूवमेंट बनाए हैं। वे कहती हैं, एक अच्छे नृत्य निर्देशक में अनुशासन, बड़ों का आदर करने की भावना और काम में लगन का गुण होना अनिवार्य है। यही सब मैंने अपने गुरु से सीखा है। वे सात साल तक चिन्नी लाल की सहायक थीं। अपने पति से पहले उन्हें नृत्य निर्देशक बनने का अवसर मिला। उस समय चिन्नी प्रकाश पर हीरो बनने का भूत सवार था। रेखा की पहली फिल्म तेलुगू में थी। फिर वहां इन्होंने चार सौ से ज्यादा फिल्मों में नृत्य निर्देशन दिया। मि. इंडिया इनकी पहली हिंदी फिल्म थी। वे हंसते हुए बताती हैं, लोग तो एक जगह जमने के बाद उसे नाम की खातिर छोड़ते नही हैं। लेकिन मैं हमेशा इंडस्ट्री बदलती रही। पहले तेलुगू, फिर तमिल, कन्नड़ और अब हिंदी फिल्मों में कोरियाग्राफी कर रही हूं। रेखा ने कुचीपुड़ी के करीब तीन सौ स्टेज प्रोग्राम किए हैं। उन्होंने पंद्रह साल तक यह नृत्य किया है। इसे वेंकटचिन सत्यम (मद्रास) से सीखा था। अभिनेत्री हेमा मालिनी और रेखा भी उनकी शिष्या थीं। (जारी )
- दिनेश ठक्कर 
(इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के हिंदी फिल्म अखबार एक्सप्रेस स्क्रीन के 3 दिसम्बर 1993 के अंक में आवरण कथा बतौर प्रकाशित)   


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