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शुक्रवार, 14 जून 2013

यादें : धर्मयुग में कराते चैम्पियन दादी बलसारा से भेंटवार्ता प्रकाशित

द टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप की लोकप्रिय रही हिन्दी पत्रिका "धर्मयुग" जब श्री धर्मवीर भारती के संपादन में प्रकाशित होती थी, तब उसका हर अंक अपना अलग मायने रखता था। उस वक्त "धर्मयुग" में छपना किसी भी कलमकार के लिए प्रसन्नता और गर्व का विषय होता था। यह मेरा भी सौभाग्य था कि श्री धर्मवीर भारती ने "धर्मयुग" के 5 जुलाई 1981 के अंक में जापानी क्यो कुशिन काई-कान कराते के चैम्पियन-ट्रेनर शिहान दादी बलसारा से लिया गया मेरा विशेष साक्षात्कार प्रकाशित किया था। उस समय कोलकाता निवासी फोर्थ डेन ब्लैक बेल्टधारी दादी बलसारा क्यों-कुशिन काई कान कराते (कराटे) की भारतीय शाखा के अध्यक्ष और दक्षिण पूर्व एशिया कराते फेडरेशन के उपाध्यक्ष भी थे। मेरे गृह नगर बिलासपुर के राजा रघुराज सिंह स्टेडियम में उन्होंने अपने पेट के ऊपर से कार पार करवाने का हैरतअंगेज प्रदर्शन किया था। इसके बाद मैंने उनसे वैश्विक कराते और उनकी उपलब्धियों पर आधारित भेंटवार्ता की थी, जिसे "धर्मयुग" में प्रकाशित किया गया था। श्रद्धेय श्री धर्मवीर भारती के प्रोत्साहन के कारण ही मुझे पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर लेखक-पत्रकार बतौर पहचान मिली। बाद में जब श्री गणेश मंत्री कार्यवाहक संपादक और श्री विश्वनाथ सचदेव संपादक बने, तब भी उनके संपादकीय विभाग द्वारा टेलीग्राम के जरिये विषय प्रेषित कर मुझसे छत्तीसगढ़ अंचल से जुड़ी विभिन्न रिपोर्ताज मंगाई जाने लगी। "धर्मयुग" में मेरी रिपोर्ताज के प्रकाशन का सिलसिला वर्ष 1993 तक अनवरत जारी रहा। फिर जनसत्ता मुम्बई से जुड़ने के कारण "धर्मयुग" के लिए मेरा लिखना बाधित हो गया। कालांतर में "धर्मयुग" का प्रकाशन बंद हो जाना दुखदायी रहा। इस पत्रिका की अब यादें ही शेष रह गई हैं। मेरी प्रकाशित रिपोर्ताज वाले इसके अंक मेरे संग्रहण में अब भी सुरक्षित हैं, जो मेरे लिए धरोहर सदृश्य हैं।                           
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