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रविवार, 2 सितंबर 2012

"पानी वही बचा सकता है, जिसकी आँखों में पानी हो"

पानी की कमी के कारण आज छत्तीसगढ़ के लोग मजदूरी करने अन्य राज्यों में पलायन कर रहे हैं. उनके खेतों को पानी नहीं दिया जा रहा है. औद्योगिक घरानों के यहाँ आने से पानी का अभाव पैदा हुआ है. औद्योगिकरण के बाद भी मजदूरी के लिए गरीब छत्तीसगढ़वासियों को राज्य से बाहर जाना पड़ रहा है. यह विचार शनिवार को पूर्व सांसद और गांधीवादी चिन्तक केयूर भूषण ने व्यक्त किये. वे होटल सेन्ट्रल पाइंट, बिलासपुर में राष्ट्रीय जल नीति २०१२ पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि थे.ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव फोरम की छत्तीसगढ़ इकाई के तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी के प्रथम सत्र में केयूर भूषण ने कहा कि आदिवासियों की जमीन औद्योगिक घरानों को दिए जाने जैसी बातों का राष्ट्रीय जल नीति के प्रारूप में विचार होना चाहिए. मुख्य वक्ता संजय विश्वास का कहना था कि सहज रूप से पानी प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार है. जबकि औद्योगिक घरानों ने पानी को एक बिकाऊ मॉल बना दिया है. पानी के निजीकरण और व्यवसायीकरण से औद्योगिक घराने अंधाधुंध मुनाफ़ा कमा रहे हैं. इससे पानी महँगा हो गया है. आगे चलाकर पानी आम आदमी के लिए दुर्लभ हो जाएगा. 
वक्ता अनिल राजिमवाले ने कहा कि पानी उस जड़ का काम करता है जिसके बिना संस्कृति का विकास नहीं होता. दुःख की बात है कि पानी से धन कमाने वालों को पूरी छूट मिली हुई है. गौतम बंदोपाध्याय ने कहा कि पानी की चर्चा हमारी सांस्कृतिक धरोहर की चर्चा है. पानी का बाजारीकरण करना ठीक नहीं है. पानी वही बचा सकता है जिसकी आँखों में पानी हो. तभी पानीदार समाज की कल्पना की जा सकती है. पहले सत्र के समापन पर राज्य संयोजक चितरंजन बख्शी ने भावी योजनाओं की जानकारी दी. स्वागत भाषण महापौर श्रीमती वाणी राव ने दिया. संचालन वरिष्ठ पत्रकार नथमल शर्मा ने किया. इस अवसर पर शहर के प्रबुद्ध जन उपस्थित थे. 
राष्ट्रीय जल नीति के नए मसौदे पर बिलासपुर में भी बहस की शुरूआत होना अच्छा संकेत है.आम आदमियों से राष्ट्रीय जल नीति का गहरा नाता है. जल है तो जीवन है, यह जुमला इंसान के भी अस्तित्व से जुड़ा हुआ है.पानी क्या केवल एक प्राकृतिक संसाधन है अथवा जीवन के निरंतर विकास का मूलाधार है, इस बात पर भी विद्वतजनों की बहस सामाजिक सरोकार की तरफ इशारा करती है. ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव फोरम से जुड़े जल नीति विशेषज्ञ के. सोमन ने अपने शोधपरक पर्चे में खुलासा किया है कि "नई नीति में जल की उपलब्धता  का उल्लेखित डाटा वही है, जो २००२ की राष्ट्रीय नीति में भारत की भौगोलिक सीमाओं के भीतर है. जो १९९३ के आंकलन पर आधारित है. यद्दपि नई नीति बदलते जलवायु परिदृश्यों में तथा अन्य तथ्यों की आवश्यकता की बात करती है. किन्तु जल संसाधन में तेजी से आते भूमंडलीय परिवर्तन के देश के जल परिदृश्य पर ठोस और निर्णयात्मक विचार करने का प्रयास करती नहीं दिखाई देती है. बाहरी और स्थानीय जलवायु परिवर्तनों के अंतर्संबंधों की भी सुविधानुसार उपेक्षा की गई है. नई नीति भूगर्भीय जल को लोक संपदा के रूप में देखने पर आपत्ति जताती है. इसमें मांग आधारित सेवा दी जाने की वकालत करने के साथ विभेदाकारी टैरिफ के प्रस्ताव हैं. किसी गरीब को जीवन सहायक या राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की पूर्ति कैसे होगी, यह मसौदे में वर्णित नहीं किया गया है. यह नीति जल को एक आर्थिक उत्पाद मानते हुए इसके प्रभावशाली कीमत की वकालत करती है". के. सोमन अपने पर्चे में यह भी लिखते हैं कि "जल लोगों का मूल अधिकार है न कि बेचे जाने वाली और व्यावसायिक चीज. मानव, पशु-पक्षी और पौधों के लिए जल वरदान है. इस पर इनका अधिकार है. जल नीति राष्ट्र के भौगोलिक, ऐतिहासिक, अलग अलग क्षेत्रों की मिट्टी की विविधताओं और उसके भूजल के स्तर डाटा के संबंधों और सामान्य औसत वर्षा तथा वैज्ञानिक आधार पर हो". बहरहाल, बिलासपुर की तरह छोटे शहरों और गाँवों में भी राष्ट्रीय जल नीति पर सार्थक चर्चा और बहस होनी चाहिए, जिससे जल जैसे उपयोगी ज्वलंत मुद्दे पर आम आदमी की भी सहभागिता बढ़े.
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