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बुधवार, 28 दिसंबर 2011

सत्यदेव दुबे के रंग और कर्म का सच - (२)


कच्चे रास्ते के ठीक बीचों बीच/ अब भी राख का धब्बा पडा होगा/ बहुत पहले कभी मैंने/ नीम की पीली झरी पत्तियों की/ ढेरी जलाई थी/ धुआं कडवाहट मुझे स्वीकार है.... सत्यदेव दुबे अपने पड़ोसी मित्र डा. धर्मवीर भारती द्वारा लिखित कविता "फागुन में शेष" की उक्त बेबाक पंक्तियाँ अक्सर गुनगुनाते थे. खासकर, जब कोई अन्तरंग व्यक्ति उनके व्यक्तित्व के उलझे व्याकरण पर कटाक्ष करता था, तब वे इन्हीं पक्तियों के माध्यम से अपनी अंतर्मुखी अभिव्यक्ति प्रकट करते थे. इसका मुख्य कारण यह था जीवन भर उन्होंने छद्म आवरण कभी स्वीकार नहीं किया. जो भीतर था, वह ज्यों का त्यों बाहर था. वे अपने आप को वे बेलगाम घोड़े के सदृश्य नहीं बल्कि एक बेलाग इंसान जरूर समझते थे. यद्दपि उन्हें जीवन पर्यंत थियेटर और सिने इंडस्ट्री के कुछ बौद्धिक ईर्ष्यालु जनों द्वारा असामाजिक करार दिए जाने की कोशिश की जाती रही. असल में वे अंतर्मुखी थे. मुंह फट थे. किन्तु दिल के साफ़ थे. उनके आचार, विचार और व्यवहार में एकरूपता थी. अपनी बेबाक अभिव्यक्ति में वे किसी नासमझ और गैर जिम्मेदार व्यक्ति की दखलंदाजी बिलकुल बर्दाश्त नहीं करते थे. उन्हें अपनी बाहरी दिखावटी छवि अपनाने की कोई गरज नहीं थी. उन्हें किसी की परवाह नहीं थी. परवाह थी तो केवल अपने बेहतर काम की. उनके विचारों में कोई अंतर्विरोध नहीं था. कहीं भी "शो पीस" बनना उन्हें कभी मंजूर न था. जुबान, दिल और दिमाग एक था. इसमें कोई बेजा घालमेल नहीं था. उत्कृष्ट सृजन के नाम पर विचारों और संवेदनाओं की तानाशाही बाह्य रूप से कभी कभी अवश्य दृष्टिगोचर होती थी, परन्तु उनका अंतर्मन कुछ अलहदा था. उन्हें मुंबई के थियेटर क्षेत्र में आदरपूर्वक "पंडित जी" के नाम से संबोधित किया जाता था. लेकिन कोई वर्कशाप हो या प्ले की रिहर्सल हो अथवा सेमीनार, यहाँ उनके प्रशिक्षण-निर्देशन की शैली, संवाद, व्याख्यान और संबोधन में जातिगत पांडित्य कहीं नहीं झलकता था. वे रौबदार ठाकुर के अंदाज में पेश आते थे. उनका यह स्वरुप सृजन की नयी पीढी के हस्ताक्षरों की समझ से भी परे होता था.
सत्यदेव दुबे के लिए उनका भोगा यथार्थ और अनुभवजनित आक्रोश उन्हीं के व्यक्तित्व के व्याकरण की अवधारणा बन गया था. मुंबई के पृथ्वी थियेटर में शुरूआती सक्रियता के दौरान ही मुखौटाधारी रंगकर्मी उन्हें रंगकर्म जगत का परशुराम और दुर्वासा ऋषि कहने लग गए थे. उनके बेबाकी और कड़े कार्य-अनुशासन की खुले आम आलोचना होने लगी. उनका  "बुलिश एटीटयूट" खुद की थियेटर यूनिट के शिष्य कलाकार, कर्मियों को शुरू में समझ नहीं आता था, किन्तु उनके जायज क्रोध की आग में तपने के बाद वे कुंदन बन जाते थे. वास्तव में वे रंगकर्म के आश्रम के एक ऐसे गुरू ऋषि द्रोणाचार्य थे, जिन्होंने कई नौसीखिए को अभिनय के प्रभावी तीर तरकश से लैस किया था. छिपकर उनकी कला को आत्सात करने वाले कई एकलव्य अच्छे कलाकार भी बने, किन्तु सत्यदेव दुबे ने उनसे कोई गुरू दक्षिणा नहीं ली वरन कुछ एकलव्य कलाकारों ने उन्हें अंगूठा दिखाकर अवश्य चिढाया. जबकि इन्होने पौराणिक काल के गुरू द्रोणाचार्य की मानिंद व्यवस्था के साथ कोई समझौता नहीं किया, जिससे इनका आचार्य कला-कर्म बदनाम होने से बच गया. गुरू द्रोणाचार्य के किरदार का सच उन्होंने स्वयं के संघर्ष से भलीभांति समझ लिया था. इसीलिये सत्यदेव दुबे अपने बिलासपुर ( वर्ष १९७४ से मुंबई वासी हुए थे ) के नाटककार मित्र डा.शंकर शेष द्वारा लिखित नाटक "एक और द्रोणाचार्य" का भी सटीक मंचन मुंबई में कर सके थे.  इस नाटक के जरिये उन्होंने यह साबित करने की सफल कोशिश की थी सही मायने में आज कौन गुरू द्रोणाचार्य है और कौन नहीं. कथ्य और शिल्प की दृष्टि से शक्तिशाली इस नाटक को उन्होंने एक नया कलेवर दिया था. नए जमाने के अध्यापक अरविन्द और पौराणिक काल के गुरू द्रोणाचार्य का परस्पर पूरक व्यक्तित्व तथा उनका बिम्ब-प्रतिबिम्ब को मंच पर जीवंत करना नाट्य गुरू सत्यदेव दुबे के चुनौतीपूर्ण था, जिसमें वे शिद्दत के साथ कामयाब रहे.
सत्यदेव दुबे को दो-चार मुलाक़ात में समझना आसान नहीं था. मेरे साथ भी यही हुआ था. बिलासपुर में वर्ष १९८० से सक्रिय पत्रकारिता से जुड़ने से पहले भी मैं विद्यार्थी जीवन में हर साल गर्मी की छुट्टियों में मुंबई अपनी बुआ के यहाँ जाता था. वहां गुजराती नाटकों का क्रेज होने के कारण चर्चित नाटक अवश्य देखता था. लेकिन टिकट खरीद कर हिन्दी नाटक व्यावसायिक मंच पर देखने का सिलसिला बिलासपुरिया सत्यदेव दुबे के आकर्षण के कारण ही प्रारंभ हो सका. शालेय जीवन के दौरान बिलासपुर के अपने मुहल्ले जगमल ब्लाक में पड़ोसी रंगकर्मी सुनील मुखर्जी के कारण ही हिन्दी नाटकों से मेरा लगाव हुआ था. उन्होंने ही मुझे सबसे पहले सत्यदेव दुबे और डा. शंकर शेष की नाट्य  उपलब्धियों के बारे में बताया था. फिर मेरी महाविद्यालयीन शिक्षा के वक़्त सुनील मुखर्जी पड़ोस के मुहल्ले दयालबंद रहने चले गए थे. तब भी उनके साथ होने वाली बैठकों में सत्यदेव दुबे का ही फालोअप जिक्र होता था. इसलिए मैं सत्यदेव दुबे के मूल स्वभाव से परिचित था, लेकिन उनकी रंग-कला से मैं रूबरू हुआ मेट्रिक करने के बाद. डा. शंकर शेष द्वारा लिखित नाटक "अरे मायावी सरोवर" को सत्यदेव दुबे ने वर्ष १९७४ से मुंबई में मंचित करना आरम्भ कर दिया था. टिकट खरीदकर देखा गया मेरा पहला दर्शनीय हिन्दी नाटक यही था. इसी नाटक के माध्यम से सत्यदेव दुबे की रंग-शैली से पहली बार मेरा साक्षात्कार हुआ. फिर तो जब भी मैं मुंबई जाता तब स्थानीय हिन्दी अखबारों को पढ़ कर पता लगाने की कोशिश करता सत्यदेव दुबे का नाटक कहाँ खेला जा रहा है.
वर्ष १९९३ में जब मैं बिलासपुर छोड़ कर मुंबई में पत्रकारिता करने गया, तब कला, संस्कृति, फिल्म मेरा विषय क्षेत्र होने के कारण पांच साल के दरम्यान सत्यदेव दुबे से ख़ास अवसर पर ही मेरी मुलाकात होती थी. वर्ष १९९४ के सितम्बर माह के आख़री हफ्ते में पहली बार उनके साथ मेरी व्यक्तिगत बैठक जुहू के जानकी कुटीर के पास स्थित फिल्म अभिनेता शशी कपूर के पृथ्वी थियेटर के कैफे में हुई थी. माध्यम थी शशी कपूर की पुत्री अभिनेत्री संजना कपूर, जो उस समय पृथ्वी थियेटर के प्रबंधन का कार्य भार सम्हाले हुई थी. उस बैठक के दौरान जब मैंने सत्यदेव दुबे को अपने प्रारंभिक परिचय में बिलासपुर का मूल निवासी होने का जिक्र किया तो वे थोड़े नाराज हुए लेकिन मेरा पूरा परिचय जानने और विविध लेखन कार्य से अवगत होने के बाद ही उन्होंने "लिफ्ट" दी. काफी पीने के दरम्यान जब मैंने उन्हें बताया सम्पादक धर्मवीर भारती ने राष्ट्रीय पत्रिका "धर्मयुग" के ५ जुलाई, १९८१ के अंक में मेरे द्वारा लिया गया कलकत्ता के कराटे मास्टर दादी बलसारा का साक्षात्कार प्रकाशित किया था, धर्मवीर भारती के कारण ही धर्मयुग में लगातार मेरी रपट छपने का सिलसिला शुरू हुआ था, यह जान कर सत्यदेव दुबे प्रसन्न हो गए. मेरे प्रति उनका नजरिया एकाएक सकारात्मक हो गया. वजह थे धर्मवीर भारती. सत्यदेव दुबे को जब मैंने यह भी बताया जनसता, मुंबई की रविवारी पत्रिका "सबरंग" में अपने स्तम्भ "मंच" में मुंबई के रंगमंच की शोधपरक सीरिज लिख रहा हूँ. १८ सितम्बर,१९९४ के अंक में पृथ्वी थियेटर पर भी लिखा हूँ, इसकी फोटो कापी देने पर वे ज्यादा खुश हुए. लेकिन जब मैंने उनसे भेंट वार्ता देने का आग्रह किया तो साफ़ इनकार कर दिया. उनका तर्क था "मैं छपने में नहीं, काम करने में भरोसा रखता हूँ, लिखना है तो सिर्फ मेरे नाटकों पर लिखो, मुझ पर नहीं".
दरअसल, सत्यदेव दुबे की सोच स्पष्ट थी. वे स्वयं को मीडिया में महिमा मंडित नहीं करवाना चाहते थे. अपनी मार्केटिंग कला के जरिये ही करने के वे पक्षधर थे. इसीलिये संजना कपूर कहती भी थी "सत्यदेव दुबे अपने आप में ड्रामा स्कूल हैं". यह गौरव उक्ति सौ फीसदी सत्य थी. इसीलिये वे नाटकों के निर्देशन की शतकीय पारी खेल सके.
वे नयी पौध को हमेशा अपने अनुभव से बेहतर रंगकर्म के लिए उत्प्रेरित किया करते थे. जीवन के ज्यादातर लम्हों में वे दूसरों से नहीं बल्कि स्वयं से संबोधित होते रहते थे. उनके भीतर का निष्पक्ष रंगकर्मी खुद से सवाल किया करता था.जवाब ढूँढने के लिए वे अपने आसपास और कभी यादों तथा अनुभवों के पृष्ठ पलटते थे. इसके अलावा वे अपने अन्तरंग मित्रों जिसमें डा. धर्मवीर भारती भी शामिल थे, का लिखा, पढ़ा और सुना प्रेरणा तथा सृजन का स्त्रोत हुआ करता था.खुद का अनुभव, अध्ययन और चिंतन सृजन में सहायक था ही. कलात्मक कृति और सृजन शिल्प का भेद समझने के लिए उनकी स्वयं की अभ्यस्त संवेदनशीलता और अक्खडपन भी मददगार था. इसीलिये उनके नाटकों में भी चाक्षुष बिम्ब रूपों का प्रयोग होता था. प्रतीकात्मक मुद्राओं के बजाय वे सीधे साफगोई सूचनात्मक तरीके को तरजीह देते थे. अति नाटकीयता से वे परहेज किया करते थे. नाट्य भाषा के निरंतर विघटन को लेकर वे अंतिम समय तक चिंतित थे.
सत्यदेव दुबे ने दो नाव पर सवारी करने के बावजूद अपना मूल कला कौशल नहीं छोड़ा. शोषित स्त्री समाज की विभिन्न त्रासदियों को कलारूपों के जरिये फ़िल्मी परदे पर संवादों को परोसा था. यह अलग बात है वे स्वयं अपने दाम्पत्य जीवन में असफल साबित हुए थे. जीवन संगिनी स्त्री न बन सकी, बल्कि जीने का सहारा सृजन रहा. इनकी कोई संतान नहीं थी. हालांकि अपने भाई राजा बाबू दुबे के पोते फिल्म अभिनेता सत्यजीत (सुतीक्ष्ण दुबे के  पुत्र) को ही अपना पोता और वारिस मान कर स्नेह देते रहे. बिलासपुर में अपनी जमीन जायदाद की देखरेख का जिम्मा पारिवारिक मुनीम के पुत्र रमेश अग्रवाल को दे रखा था. सत्यदेव दुबे एकाकीपन से वे टूटे नहीं वरन अधिक मजबूत हुए थे.
सत्यदेव दुबे ने जब समानांतर हिन्दी सिनेमा का रूख किया तब भी उन्होंने अपनी शर्तों पर ही पट कथा और संवाद का लेखन किया. उन्होंने पट कथा, संवाद के माध्यम से सिने भाषा को नव आयाम दिया. सामाजिक अवमूल्यन को उन्होंने बेबाकी से आइना दिखलाया. सामाजिक असलियत को खडी बोली में दमदारी से पेश किया.
समानांतर या फिर कला सिनेमा की जटिल भाषा को आम बोलचाल की भाषा में बदलने की कोशिश कामयाब रही. निर्देशक श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलानी ने अपनी फिल्मों में सत्यदेव दुबे की सार्थक सोच को कलात्मक जगह दी. श्याम बेनेगल की पहली हिन्दी फीचर फिल्म "अंकुर" (१९७४) की पट कथा और संवाद सत्यदेव दुबे ने लिखे थे. इस फिल्म को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार समेत देश विदेश के ४३ पुरस्कार मिले थे. इसके बाद सत्यदेव दुबे ने श्याम बेनेगल की फिल्म "निशांत"(१९७५) लिखी, जिसे सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. शिकागो फिल्म समारोह में इसे "गोल्डन प्लेक"से सम्मानित किया गया था. श्याम बेनेगल की फिल्म "भूमिका" (१९७७) के लिए सत्यदेव दुबे को १९७८ में सर्वश्रेष्ठ पट कथा लेखन का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. फिर श्याम बेनेगल की फिल्म "जुनून" (१९७८) के लिए सत्यदेव दुबे को फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया था. इस फिल्म को सातवें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के उदघाटन अवसर पर भी दिखलाया गया था. फिल्म "कलियुग" (१९८०), "आक्रोश" (१९८०), "विजेता" (१९८२), और "मंडी" (१९८३) में भी सत्यदेव दुबे का लेखन सशक्त तरीके से सामने आया था.
सत्यदेव दुबे ने अपनी इन सभी समानांतर फिल्मों के माध्यम से दर्शकों और समीक्षकों के बीच जीवंत संवाद सूत्र स्थापित किया था. अपनी पट कथा और संवाद में उन्होंने किरदारों की छवियों को सहज और सारगर्भित बनाया था, जो दर्शकों को कतई सिनेमाई नहीं लगती थी. दर्शकों को ऐसा लगता था जैसे वे अपने आसपास के दृश्यों को जीवंत होते देख रहे हैं. उनकी पट कथा और संवाद में फिल्म की मूल कहानी के तत्त्व सटीक और स्पष्ट होते थे. संवादों में आम आदमी के बोलचाल के शब्द होने की वजह से वह फिल्म निर्देशकों, कलाकारों और दर्शकों को  भी सहज लगती थी. पट कथा में सूक्ष्म ब्यौरे और उनके किरदार अक्सर क्रुद्ध प्रतिक्रियाएं देते थे, क्योंकि वे इसी शोषित समाज का हिस्सा थे. अपने संवाद में सत्यदेव दुबे बड़े सच को भी छोटे छोटे विवरण और असल दृष्टांत से प्रतिस्थापित करते थे. उनके संवादों में उनकी उपस्थिति रहती थी, जो कलाकारों द्वारा अदायगी के वक़्त उसे जीवंत कर देती थी. वे अपने इर्दगिर्द के प्रसंगों को भी दिमागी सूझ बूझ के साथ संवादों में बखूबी पिरोते थे. फिल्म "मंडी" में सत्यदेव दुबे ने बिलासपुर के अपने मोहल्ले गोंड पारा स्थित चित्रगुप्त धर्मशाला के चबूतरे में फाकामस्त निवास करने वाले और पेशे से कुआं साफ़ करने वाले ६० वर्षीय शराबी गोंड आदिवासी टून्ग्रुस (इसकी मौत सिविल लाइन के एक कुएं को साफ़ करते वक़्त जहरीली गैस से हुई थी) का नाम अभिनेता नसीरूद्दीन शाह के किरदार के लिए इस्तेमाल किया था.जो इस फिल्म में नायिका रूकमनी बाई
(शबाना आजमी) का भरोसेमंद सहायक पुरूष होता है. सत्यदेव दुबे ने दो लघु फिल्म "अपरिचय के विंध्यांचल" और "टंग इन चीक" का भी निर्माण किया था. मराठी फिल्म "शांता ताई" का निर्देशन भी किया था. दूरदर्शन पर प्रसारित हुए श्याम बेनेगल के ऐतिहासिक सीरियल भारत एक खोज में चाणक्य की भूमिका बखूबी अदा कर सत्यदेव दुबे ने अपने सशक्त अभिनय का लोहा भी मनवाया था. सत्यदेव दुबे को आम फ़िल्मी नुस्खों से बेहद चिढ थी. सतही दर्शकों से से उनकी कोई गंभीर अपेक्षा भी नहीं थी. वे आख़री वक़्त तक समानांतर सिनेमा की सम्भावनाओं की खोज में जुटे हुए थे. समझौतावादी न होने के कारण आगे चल कर श्याम बेनेगल से भी अलगाव हो गया था. उन्होंने खुद को समानांतर सिनेमा की भाषा और उसमें अन्तर्निहित कलात्मक सम्भावनाओं तक सीमित रखा. खालिस धंधेबाज फार्मूला फिल्मों के ताने बाने में स्वयं को बेवजह उलझाना नहीं चाहते थे. वे इंग्लिश के अच्छे ज्ञाता होने के कारण हालीवुड के अलावा अन्य पश्चिमी देशों की प्रसिद्ध कलात्मक फिल्मों पर दृष्टिपात अवश्य करते थे, लेकिन उनके सृजन का मुख्य सरोकार देसी शोषित समाज से होता था. अपने जीवन के अंतिम समय वे बीमार होने से पहले राम नाम सत्य के नाम से एक फिल्म की पट कथा लिख रहे थे. किन्तु पट कथा का यह नाम इन्हीं पर लागू हो जाएगा कल्पना नहीं थी. ( समाप्त )        

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र : गूगल से साभार)                                                                           
                                                                                                             
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