अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

रविवार, 4 दिसंबर 2011

देव आनंद : अदाएं अब भी जवान हैं (२)


वरिष्ठ संगीतकार नौशाद का मानना है "देव को मैंने हमेशा जवान ही देखा है. दिलीप कुमार के जमाने के यह सीनियर हीरो हैं. आज भी वे गुजरे जमाने की तरह दिखते हैं. वे जिन्दगी के उसूलों के रहबर हैं. जिन्दगी का रखरखाव और उसूल लोगों को ग्रहण करना चाहिए. पहले की तरह वे आज भी खुश रहकर व्यस्त रहते हैं. वे अच्छे फनकार तो हैं साथ ही अच्छे इंसान भी हैं. हालांकि देव के साथ संगीतकार बतौर जुड़ने का इत्तेफाक नहीं हुआ लेकिन आपसी प्रेम हमेशा बना रहा. वैसे उनकी फिल्मों में सचिनदेव बर्मन और जयदेव का संगीत उम्दा था. वे बड़े गुनी लोग थे.वह हमारा ही संगीत लगता है. देव की फिल्मों के संगीत में हिंदुस्तानीपन था. गाइड के गाने तो आज भी लोगों की जुबान पर हैं." जुबली कुमार माने जाने वाले राजेन्द्र कुमार का कहना है "देव जी ने जो अभिनय किया है, जिन्दगी में जो कुछ किया है, उसे कम लोग ही कर पाते हैं. सही अर्थों में वे कर्मयोगी हैं. वे हमेशा व्यस्त रहते है. युवा पीढी के वे आदर्श बन गए हैं. उनके अभिनय में विविधता है. उनका अभिनय और व्यक्तित्व प्रेरणादायक है." इम्पा के अध्यक्ष और फिल्म "अंदाज अपना अपना" के निर्माता विनय सिन्हा का कहना "देव आनंद का हर अंदाज अनूठा है. चाहे उनके बात करने का हो या काम का. उनकी शैली में देव आनंद छाया रहता है. जब मैं "देश परदेस" और "लूटमार" के समय अमजद खान का सचिव था, तब देव साहब के काफी संपर्क में रहा. उस समय और आज उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं देखा. उसी फुर्ती और ऊर्जा के साथ वे काम कर रहे हैं. उनके जैसी लगन आज लोगों में कम है. वे आज भी २५ साल के युवक लगते हैं. मेरी कामना है अंत तक जवान बने रहे."
वरिष्ठ लेखक और बीआई टीवी के अधिकारी कमलेश पाण्डेय का मानना है "आज के हीरो का का फ़िल्मी जीवन चंद बरसों का होता है. लेकिन देव आनंद के पचास वर्ष भी कम लगते हैं. उनका जादू अब भी कायम है. इंडस्ट्री में देव आनंद की तरह आदमकद लोग नहीं रहे. केवल छः फुट की उंचाई होने से वह आदमकद नहीं हो सकता. वह देव आनंद की उंचाई कभी नहीं पा सकता. देव साहब ने दरअसल एक नया स्कूल शुरू किया है. दिलीप कुमार, राजकपूर और देव साहब ने दर्शकों की जरूरतें अलग अलग ढंग से पूरी की हैं. दिलीप कुमार ने कुंठाएं, भावनाएं और असफल प्रेम की अभिव्यक्ति युवा पीढी को परोसी है. राजकपूर ने सामाजिक और आर्थिक परिवेश में अभिनय को अभिव्यक्ति दी. जबकि देव साहब ने अभिनय को अलग मोड़ दिया. चाल, ढाल, सबका अंदाज मस्ती भरा था. फिर भी वह हिन्दुस्तानी था. देव साहब, दिलीप कुमार और राजकपूर के बीच की आवश्यकता बन गए थे. वही व्यक्तितत्व आगे चल कर शम्मी कपूर के रूप में निखर कर सामने आया. शम्मी कपूर ने उसे अंतिम उंचाई तक पहुंचाया. हालांकि देव साहब ने अपने आपको एक ढाँचे में सीमित कर लिया है. उनकी शैली पूरी तरह विकसित नहीं हो सकी. उनके मशहूर होने में शैली एक जंजीर बन गई. इसके बावजूद देव आनंद सदाबहार हैं."
निर्देशक रमेश सिप्पी ने कहा- "देव साहब शुरू से उर्जावान रहे हैं. वे दिलचस्प और प्यारे हीरो हैं. उस जमाने में उन पर जिस तरह लड़कियां मरती थी, आज ऐसे हीरो कम ही हैं. उनका काम अनुशासित होता है. दिलीप कुमार और राज कपूर की तरह वे भी इंडस्ट्री के सशक्त स्तम्भ हैं. भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता." ( दिनेश ठक्कर )
( जनसत्ता, मुंबई में २८ जुलाई १९९५ को प्रकाशित )                 
एक टिप्पणी भेजें