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गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

रंगकर्म की अलख जगाई है सुनील मुखर्जी ने

( दिनेश ठक्कर )
सुनील मुखर्जी एक ऐसी सख्शियत का नाम है, जिसने बिलासपुर के सार्थक "रंग-आन्दोलन" का सक्षम नेतृत्व किया है. ये अपनी सक्रियता से सृजनात्मक कला-कर्म जागृत करने में सफल रहे हैं. इनके महती योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता. आज नगर के रंग परिदृश्य में थोड़ा बदलाव आया है.यहाँ का रंगकर्म सक्रियता और नवीनता की दिशा की ओर अग्रसर हुआ है. प्रतिकूल संख्या, सोच और जुड़ाव में कमोवेश वृद्धि ही हुई है. इन सब उपलब्धियों में बिलासपुर के युवा रंग कर्मी सुनील मुखर्जी का अनेकामुखी रंग प्रयत्न महत्वपूर्ण और सराहनीय है. सुनील ने अपने रंगकर्म प्रयोग से एक स्थायी प्रभाव छोड़ा है. रंगकर्म की पूर्व विश्लेषित अवधारणा के अलावा अनुभव का सम्मिश्रण इनकी खासियत है.
सुनील मुखर्जी ने अपनी अभिनय क्षमता को विविध रूपों में प्रदर्शित करने में सदैव सफलता पाई है. नाटक के दौरान वे अपने पात्र के हर पहलुओं को बखूबी संप्रेषित करते हैं. साथ ही अपने पात्र की मनोभावनाओं को सजीवता से मंच पर रूपायित भी करते हैं. संवाद अदायगी और आवाज के उतार-चढ़ाव में ये काफी कुशल हैं. वाक् अनुशासन का वे पूरा ध्यान रखते हैं. अभिनय के अलावा वे अपनी निर्देशन प्रतिभा के माध्यम से सजीव रंग अनुभव भी प्रकट करते रहे हैं. रूप सज्जा और मंच तकनीक में में भी ये दक्ष हैं. वहीं दूसरी तरफ प्रकाश नियोजन तथा ध्वनी संकेत का भी इन्हें समग्र ज्ञान है. जिसका उपयोग वे अपनी हर प्रस्तुति में करते हैं. इनकी संस्था "नाट्य चक्र" गंभीर और तल  स्पर्शी रंग प्रदर्शनों के लिए प्रदेश में चर्चित रही हैं. विभिन्न कथोपकथन के नाटकों के जरिये रंग चेतना को सार्थक विस्तार देने में यह संस्था सदैव आगे रही है.
सुनील मुखर्जी की अगुवाई में रंग शिविरों का आयोजन भी होता रहा है. शहर के रंगकर्म को सक्रिय आन्दोलन में तब्दील करने हेतु इन्होंने अनेक स्थानीय युवकों को प्रशिक्षित कर उनमें नाट्य रुचि की अलख जगाई है. यूं तो सुनील मुखर्जी ने तीस से ज्यादा नाटकों का सफल मंचन किया है. लेकिन नाटक अंधा युग, सिहांसन खाली है, भस्मासुर अभी ज़िंदा है,गवर्नमेंट इन्स्पेक्टर का प्रदर्शन बहुप्रसंशिता रहा है.नाटक ढोंग, उलझन, ज़माना, नेफा की एक शाम, पैसा बोलता है, अर्थम् सत्य, मान्मई गर्ल्स स्कूल, खून की आवाज, चिराग जल उठा, शहीदों की बस्ती, जरूरत है श्रीमती की, मौत के साए में, सरहद, दामाद, रास्ते मोड़ और पगदंडी,कुत्ते, शादीशुदा ब्रम्हचारी, सिंहासन खाली है, गवर्नमेंट इन्स्पेक्टर, घर का मोर्चा, विभाव, इतिहास चक्र, रानी नागफनी की कहानी, खेल जारी है, बाप रे बाप, अखाड़े के नगाड़े, रन दुन्दुभी (बँगला), रात्रिशेष (बँगला) में इनके जीवंत अभिनय को लोग आज भी विस्मृत नहीं कर पाए हैं.
इसी प्रकार सुनील मुखर्जी ने नाटकों में अपनी निर्देशन क्षमता का जौहर भी दिखाया है.नाटक फिंगर प्रिंट, लौट के बुद्धू घर को आये, ज़माना, घर का मोर्चा, पैसा बोलता है, उलझन, जरूरत है श्रीमती की, रास्ते मोड़ और पगडंडी, अंधा युग, आकाश झुक गया, कुत्ते, सिंहासन खाली है, भस्मासुर अभी ज़िंदा है, गवर्नमेंट इन्स्पेक्टर, इतिहास चक्र आदि में इनका निर्देशन तारीफे काबिल रहा है.
सुनील मुखर्जी का जन्म २० दिसंबर १९४१ को तुमसर रोड (महाराष्ट्र) में हुआ था. नवभारत को दी गयी विशेष भेंट में वे कहते हैं- "मैंने हमेशा अपना जन्म  दिन  नाट्य मंचन के दौरान ही मनाया है. संयोग देखिये इस साल भी मैं अपना जन्म दिन शास्त्री शाला के होने वाले वार्षिकोत्सव के अंतर्गत दो नाटकों के मंचन के समय मनाऊँगा". आपने रंग यात्रा की शुरूआत कब से की. इस सवाल के जवाब में उन्होंने बताया "सन १९५८ में राजकुमार अनिल ( भाई ) के निर्देशन में नाटक "और इंसान बदल गया" छेदीलाल सभा भवन में मंचित हुआ था. यही मेरे जीवन का पहला नाटक था, जिसमें मैंने अभिनय किया था. इस समय मैं कक्षा दसवीं का छात्र था. इसके बाद से मैं अपने मोहल्ले जगमल ब्लाक के सरस्वती पूजा उत्सव, गणेश उत्सव में नाट्य गतिविधियों में भाग लेता रहा. मुझे पिताश्री वासुदेव मुखर्जी तथा बड़े भाई विनय मुखर्जी से प्रोत्साहन हमेशा मिलता रहा". अपने नाट्य निर्देशन के बारे में उन्होंने बताया- "जब नव नाट्यम नामक स्थानीय संस्था से जुड़ा रहा तब मैंने "फिंगर प्रिंट" नाटक से निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा. यह बात सन १९६४ की है".
आपने नाट्य विधा की विभिन्न तकनीक भी क्यों आत्मसात की? प्रत्युत्तर में सुनील मुखर्जी ने कहा- "नाटकों के मंचन के समय हुए कडवे अनुभव से मजबूर होकर मैंने मंच सज्जा, रूप सज्जा, वेशभूषा आदि का कार्य भी सम्हाल लिया. आज मुझे इसके लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. रूप सज्जा का ज्ञान मैंने अपने भाई विनय मुखर्जी तथा डाक्टर बी सी मित्रा से सीखा. जबकि मंच तकनीक बड़े भाई से. प्रकाश व्यवस्था अपने अनुभव से सीखी".
बिलासपुर की नाट्य गतिविधियों के सन्दर्भ में उन्होंने जानकारी दी- "पहले बिलासपुर में कुछ लोग तथा इक्का दुक्का संस्थाएं ही नाटक किया करती थीं. वैसे यहाँ चालीस वर्षों से नाटक होते रहे हैं.इसमें मिलन मंदिर के दुर्गोत्सव के नाटकों का उल्लेख करना जरूरी होगा". चार दशक के दौरान अभिनय तथा मंच सज्जा में आये परिवर्तन का जिक्र करते हुए सुनील ने कहा- "पहले के नाटकों में अभिनय में कलाकार पात्र की सजीवता पर मेहनत करते थे. आज उतनी मेहनत नहीं होती है. पहले के कलाकार भावाभिव्यक्ति पर जोर देते थे. सिक्वेंस के अनुसार काम करते थे. संवाद अदायगी में पारसी थियेटर की शैली और नाटकीयता का ज्यादा ध्यान रखा जाता था. पहले स्त्री पात्र का नितांत अभाव रहता था. लड़के ही उनकी जगह लेते थे. उस समय विनय मुखर्जी, एस पी दत्ता ( बँगला नाटक ), डेविड शाह तथा सायमन जान ( हिन्दी नाटक ) स्त्री पात्र के अभिनय में चर्चित थे. जहां तक दृश्य बंध का मामला है तो पहले वह प्रभावशाली ढंग से तैयार किये जाते थे. प्रसिद्द बंगला नाटक "मेघे ढाका तारा" जिसका मंचन नार्थ इस्ट इन्सी. में हुआ था. उससे प्रेरित होकर सन १९६७ में मैंने हिन्दी नाटक "मौत का साया" में पहली बार दुमंजिला सेट लगाया था. नगर यह पहला प्रयोग था"
विगत २६ वर्षों से नाट्य क्रियाकलापों में सक्रिय सुनील मुखर्जी समय समय पर विभिन्न संस्थाओं से सम्मानित होते रहे हैं. ४ अप्रैल १९६५ को पहली बार नव नाट्य संस्था ने इन्हें श्रेष्ठ अभिनय तथा निर्देशन का पुरस्कार देकर सम्मानित किया था. नाटक "अंधा युग" और "आकाश झुक गया" के सफल मंचन पर ६ अप्रैल १९७५ को भारतेंदु साहित्य समिति बिलासपुर द्वारा तथा १९८२ में बिलासपुर जेसीस द्वारा उत्कृष्ट युवा प्रतिभा सम्मान के तहत इन्हें सम्मानित किया गया था. सन १९८१ नाट्य दिशा रायगढ़ द्वारा आयोजित छत्तीसगढ़ स्तरीय नाट्य स्पर्धा में नाटक "सिंहासन खाली है" को द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ था. यही नहीं वरन सुनील मुखर्जी की क़द्र भोपाल के रंग परिक्षेत्र में भी हुई थी.सन १९७६ में मध्यप्रदेश कला परिषद् भोपाल द्वारा रविन्द्र भवन में आयोजित मध्यप्रदेश नाट्य समारोह में इनके द्वारा मंचित कराया गया नाटक "सखाराम .....  की प्रसंशा हुई थी. सन १९८१ में मध्यप्रदेश कला परिषद् द्वारा आयोजित प्रदेश के सात प्रमुख रंग निर्देशकों पर केन्द्रित मध्यप्रदेश नाट्य समारोह ( रंग सप्तक ) में नाटक "इतिहास चक्र" बेहद सराहा गया था.
नगर में नाट्य गतिविधियाँ अपेक्षाकृत तेज न होने बाबत सुनील मुखर्जी का अभिमत है- "यहाँ नयी सस्थाएं और निर्देशक बनने के पीछे एक विचित्र मनोविज्ञान काम कर रहा है. किसी कलाकार ने एक दो नाटक में काम किया नहीं बस निर्देशक बन गया. यह बात उसके दिमाग में घूमने लगती है और अपनी इच्छा को पूरी करने के लिए एक नयी संस्था बना लेता है. अभी तक तो मैंने देखा है इस तरह के लोग और संस्थाएं बमुश्किल एकाध मंचन ही कर सकी हैं. इस कारण वह न तो पूरी तरह कलाकार ही बनता है और न ही अन्य कुछ करता है.इस भावना से परे होकर यदि यहाँ के लोग काम करते रहते तो मेरा दावा है नगर में सशक्त कलाकारों का नाट्य दल होता".
शैक्षणिक संस्थाओं में रंग प्रक्रिया सुसुप्तावस्था में होने पर इनकी टिप्पणी थी- "मैंने देखा है स्कूल, कालेज में नाटकों पर सही ध्यान नहीं जाता है, जहां तक हो सके यहाँ शासन और विश्वविद्यालय को विशेष रुचि दिखानी चाहिए. जिससे आगे चलकर प्रदेश का सांस्कृतिक मंच देश में में अपना विशेष स्थान बना सके. वहीं प्रत्येक वर्ष अभिनय शिविर की भी व्यवस्था होनी चाहिए".
आप हिन्दी नाटकों के बजाय अनुदित नाटकों को ही प्राथमिकता क्यों देते हैं? इसके जवाब में उनका कथन था-
"हिन्दी में नाटक तो बहुत लिखे गए हैं परन्तु उनमें मंच तकनीक की कमी है. इसलिए हम बँगला, मराठी तथा
इंग्लिश के अनुदित तथा रूपांतरित नाटकों को मंचित करने बाध्य होते हैं". अपनी भावी योजना पर प्रकाश डालते हुए सुनील मुखर्जी ने बताया- "हमारी संस्था नाट्य चक्र ने वर्ष में दो बड़े कार्यक्रम के आयोजन का निर्णय लिया है.
मई में प्रदेश स्तरीय हिन्दी एकांकी स्पर्धा तथा दिसंबर में राष्ट्र स्तरीय सात दिवसीय नाट्य महोत्सव आयोजित किया जाएगा. इस समय हम अपनी संस्था के वार्षिकोत्सव में होने वाले राजनीतिक नाटक "महासम्मेलन" के मंचन की तैयारी में व्यस्त हैं. यह नाटक जनवरी के प्रथम सप्ताह में खेला जाएगा. इसके अलावा हम अपने कुछ नाटकों का वीडियो फिल्मांकन भी करेंगे. प्रथम कड़ी के रूप में हमने व्यंग नाटक "सिंहासन खाली है" का वीडियो फिल्मांकन कर लिया है. इसके अलावा मैं अभी दूरदर्शन के लिए एक टीवी फिल्म की पटकथा के काम में लगा हूँ. यह मेरे बड़े भाई राजकुमार अनिल ( ग्वालियर ) के एक हिन्दी नाटक पर आधारित है. इसका छायांकन हम निकट भविष्य में कर देंगे".
( नवभारत, बिलासपुर के ६ दिसंबर १९८८ के अंक में प्रकाशित )    
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