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शुक्रवार, 29 जून 2018

रामनामियों की रामनवमी

रामनामियों की रामनवमी
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17 अप्रैल, 1994 को जनसत्ता, दिल्ली के रविवारी अंक में "रामनामियों की रामनवमी" शीर्षक से मेरा आलेख प्रकाशित हुआ था. इसकी कतरन आज भी मेरे संग्रह में सुरक्षित रखी हुई है, जो कि मेरे लिए धरोहर स्वरूप है. सुधि पाठकों और अनुसंधानकर्त्ताओं के लिए यह सादर प्रस्तुत है. . 



मंगलवार, 2 मई 2017

उतार चढ़ाव

लाल बत्ती को उन्होंने
सिर से उतार ही दिया
मुखौटा उतारा उन्होंने
सूट बूट भी उतार दिया
शाही शानशौकतजादे
नौकरशाह साहबजादे
सबने ये दिखावा किया

उन्हें जिसने चढ़ा लिया  
वह भ्रष्टाचार था  
उन्हें जिसने अपनाया  
वह मालदार रिश्वत थी  
उन्हें जिसने चिपकाया  
वह रौबदार कुर्सी थी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

सोमवार, 1 मई 2017

गिद्ध ग्रास

निरंतर शोषण से मर्माहत होकर
अंतिम सांसें गिनने लगा है श्रम
दुखी होकर शोषित पसीना  
सिसकने लगा छिली त्वचा पर
दिन प्रतिदिन  
सभी सीमाएं लांघने लगा शोषण
और होने लगा गिद्धों का जमावड़ा

उखड़ती सांसों को समेटते हुए श्रम
हो रहा है अश्रुपूरित
होता जा रहा है समाप्त
शोषित पसीने से नमक
खून तो पहले ही चूसा जा चुका है
प्रतीक्षा कर कर रहा गिद्धों का झुंड  
कि शव में कब परिवर्तित हो श्रम
ताकि बनाया जा सके अपना ग्रास  
और नोंच खाएं उसका अंग प्रत्यंग

एक दिन
उधार की सांसें भी गंवा देता है श्रम
टूट पड़ते हैं गिद्ध उसकी लाश पर
और उसे अपना ग्रास बना कर
एकजुट होकर नोंच खाने के बाद  
उड़ जाते हैं नए शव की तलाश में !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)  




 

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

मसले वादे

मसलों से जुड़े वादों को
पूरा होते कभी न देखा 
सिर्फ चलती है जुबान
जुबान का पक्का न देखा
आसमां पर उछलते वादे
जमीं पर ठहरते न देखा
मज़लिसों में किए वादे  
अवाम में फलते न देखा
भूख प्यास वाले मसले
सुलझते कभी न देखा 
दिखाए गए कई सपने
सच में बदलते न देखा

बातदबीरों को मजमे में
सच्ची बातें करते न देखा 
ख़ुदगर्जों की इस भीड़ में
जमीर वाला कोई न देखा
मुदब्बिरों की जमात में
ईमानदार चेहरा न देखा 
सियासतदां की आंखों में
सच्चे आंसू कभी न देखा  
तख़्तनशीन होने के बाद
वादे निभाते कभी न देखा 
मुक़तदिर हो जाने के बाद
मुक़द्दस होते कभी न देखा ! 

@ दिनेश ठक्कर बापा  
(चित्र गूगल से साभार)



 

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

कब ढहेंगे लाल आतंक के गढ़

सवार है नासूर लाल आतंक
सियासत के स्वार्थी कंधे पर
और लाल आतंक के सिर पर
सवार है खून वीर जवानों का
लाल हो रही मिट्टी बरसों से
जवानों के बहाए गए खून से

सियासत का न खौलता खून
पोषित लाल आतंक पर कभी
इसका उबलता है खून केवल
सरहद के घुसपैठी आतंक पर

आपात बैठक में कड़ी निंदा कर  
मुआयना कर मुआवजा देकर  
कोशिश की जाती राजनीतिक
लाल आतंक समाप्त करने की
मोर्चे पर होती रहती है शहादत
मुठभेड़ों में जांबाज़ जवानों की
       
विकास के बहाने पनपा आतंक
बन चुका है विकास का बाधक
लुगरा लंगोटी का कथित दोस्त
बन गया अब जान का दुश्मन
लाल आतंक की जन अदालत
देती मौत का एकतरफा फैसला      
तोड़ती है मुखर जनों का हौंसला
दहशत के आदी हो चुके हैं वासी
हमले में ढाल बनते आदिवासी

कब तक यूं ही होती रहेगी व्यर्थ
मोर्चे पर तैनात साहसी शहादत
कब तक होती रहेगी अपमानित
संवेदनहीन सियासत से शहादत
कब तक होता रहेगा वर्गीकरण
सरहद और सूबे के आतंक का
कब ढहेंगे लाल आतंक के गढ़
जवाब मांग रहे ये ज़िंदा सवाल !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)
       
     

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

मां सरस्वती से कामना

हे मां सरस्वती
अपने पुत्र पर
कृपा करना इतनी
कि मरने से पहले
भले ही न कहलाऊं
पुरस्कृत नामी लेखक
किंतु देते रहना मुझे
ऐसे विचार और शब्द
कि मरने से पहले
पाठकों के लिए मैं
जीवंत छोड़ जाऊं
सार्थक और यथार्थ लेखन

हे मां सरस्वती
इसका नहीं है कोई अफसोस
कि नहीं बन सका क्यों मैं
मां लक्ष्मी का उपासक
नहीं बना लिखे शब्दों से धनी
किंतु अपने पुत्र पर
कृपा करना इतनी
कि बन जाऊं मरने से पहले
सार्थक सच्चे शब्दों का धनी

हे मां सरस्वती
इच्छाओं की अंतिम यात्रा में
उच्चारित हो सृजित शब्द भी
मृत देह की अंत्येष्टि के पश्चात्
गले लगाएं लोग मेरे लेखन को
दीर्घायु बनाएं जीवंत शब्दों को
अंतिम अरदास और उठावना
सार्थक सच्चे शब्दों के साथ हो
चित्र के बदले मेरे कृतित्व पर
शब्दों के श्रद्धा सुमन अर्पित हों
आंखों में अश्रुओं के स्थान पर
मेरे सृजित शब्दों की छवि हो
आंखों से आंसू न छलके बल्कि
जुबां से काव्य गीत निःसृत हो !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

रविवार, 23 अप्रैल 2017

धारोधार रोती धरती

चिमनी और सोखक
उलझ रहे थे आपस में
कि क्षमता किसमें अधिक
जो सोख सके पूरा पानी
नदियों और तालाबों का
कर सके देह निर्वसन 
और छोड़ दे मरने प्यासा


कुल्हाड़ी और आरी
काट रहे थे परस्पर
एक दूसरे की बात
हो रहा था विवाद कि
धार किसकी अधिक
जो काट सके जड़ों से
हरियाली धरती की
उसको बना सके ठूंठ
छीन सके प्राण वायु

कुदाल तथा खोदक
खोद रहे थे परस्पर
एक दूसरे का कथन
भिड़ रहे थे आपस में
इस बात बात पर कि
ताकत किसमें ज्यादा
जो कर सके छलनी  
उर्वर सीना धरती का
और दे सके गहरा घाव  

चिमनी और सोखक
कुल्हाड़ी और आरी
कुदाल तथा खोदक
जुटे थे साबित करने
स्वयं को सर्व शक्तिशाली
कर रहे थे वे वाक् युद्ध
मारक मंशा भांप कर        
दुखी असहाय धरती
रो रही थी धारोधार
धरती पर आती विपत्ति
विषम स्थिति जान कर
पर्यावरण नष्ट होता देख
प्रकृति और समय
कर रहे थे निश्चित
जघन्य अपराध का दंड
ताकि दण्डित हो सकें
रोती धरती के अपराधी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
( चित्र गूगल से साभार)